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शाहपुर एनकाउंटर: कानून बनाम सत्ता का अंतर्कलह और भाजपा के भीतर बढ़ती दरार

बिहार में हाल ही में भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुए एनकाउंटर ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस घटना में भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद, न केवल विपक्षी दल, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अपने ही वरिष्ठ नेताओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह स्थिति राज्य में भाजपा के भीतर बढ़ते वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों को स्पष्ट करती है।

भाजपा के भीतर दो फाड़: एक ओर सख्ती, दूसरी ओर सवाल

शाहपुर एनकाउंटर को लेकर भाजपा नेताओं के बयानों में दो स्पष्ट धड़े दिखाई देते हैं—एक वह जो इसे प्रशासनिक चूक मानता है और दूसरा वह जो इसे ‘सुशासन’ का हिस्सा मानकर मौन है ।

  • सवालों के घेरे में पुलिस कार्रवाई: भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने न केवल घटना की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि “कानून से ऊपर कोई नहीं है”। उनके साथ ही पार्टी के कई अन्य नेताओं ने भी इस मामले में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया है। यह दर्शाता है कि पार्टी का एक बड़ा धड़ा एनकाउंटर जैसी कार्रवाई में ‘प्रक्रियात्मक पारदर्शिता’ की कमी से असंतुष्ट है।

  • प्रशासनिक और राजनीतिक चुप्पी: दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का रुख अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का रहा है। गृह मंत्रालय संभालने के बाद से ही उन्होंने पुलिस को खुली छूट देने के संकेत दिए थे। हालांकि, शाहपुर मामले में बढ़ते जन-आक्रोश को देखते हुए प्रशासन को आनन-फानन में थाना अध्यक्ष सहित कई पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा। यह निलंबन अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि पुलिस की कार्रवाई में गंभीर लापरवाही बरती गई थी।

शाहाबाद का रण: राजनीतिक नफा-नुकसान

शाहाबाद का क्षेत्र भाजपा के लिए हमेशा से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गढ़ रहा है। ऋतुराज सिन्हा जैसे नेताओं का इस क्षेत्र से गहरा जुड़ाव है। ऐसे में, जब स्थानीय स्तर पर पुलिस की बर्बरता या लापरवाही के आरोप लगते हैं, तो भाजपा के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाता है।

यदि पार्टी के भीतर ही नेताओं द्वारा सम्राट चौधरी की पुलिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर संगठनात्मक तालमेल की कमी को दर्शाता है। शाहपुर की घटना ने यह साबित कर दिया है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर की जाने वाली कार्रवाई यदि कानून के दायरे से बाहर होती है, तो उसे स्वयं भाजपा के भीतर भी स्वीकार्यता मिलना मुश्किल है।

शाहपुर एनकाउंटर ने बिहार भाजपा को एक चौराहे पर खड़ा कर दिया है। क्या पार्टी अपराध के खिलाफ कठोर रुख अपनाकर अपनी छवि बनाए रखेगी, या फिर ऋतुराज सिन्हा जैसे नेताओं की मांग के अनुरूप जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी? फिलहाल, यह अंतर्कलह न केवल सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि यह राज्य में पार्टी के भविष्य के ‘सुशासन’ के एजेंडे पर भी सवाल खड़ा करती है।

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